हम दो भाई, जन्म से संग, पर मिलते नहीं कभी।
विपरीत दिशा में मुख हैं, किस्मत की ये कैसी ठगी!
हमारा काम बस सुनना, सुनते हर बात पुरानी,
बुरे बोल या मीठी बातें, सब कानों से जानी।
हुक बन गए धीरे-धीरे, चश्मे का बोझ उठाया,
आँखों का साथ निभाने में, हमें ही दर्द में पाया।
कहते नहीं तो क्या हुआ, सुनते तो सब कुछ हैं?
बोलने वालों की जय-जयकार, क्या हम बस यूँ ही फालतू हैं?
बचपन में खींचे गए हम, जब बात समझ ना आई,
बड़े हुए तो सज गए, पर तारीफ चेहरे ने पाई।
बालियाँ, झुमके, नथनी, सब हम पर लटके,
पर सुंदरता का श्रेय, बस आँखों-होठों को भटके।
काजल, लाली, क्रीम-पाउडर, चेहरे पर ही लगते हैं,
क्या हमने कभी कुछ माँगा? क्यों हम उपेक्षित रहते हैं?
जैसे ब्याह की बची पूरी, किनारे हम चिपका दिए,
बालों से कट भी जाए तो, डेटॉल से चुप करा दिए।
दर्द बांटने से घटता है, पर किसको हम ये बताएं?
आँखें तो बस रो देंगी, नाक बहने लग जाए।
मुँह चीखने लगेगा, दर्द हमारा समझ न पाएगा,
जनेऊ, पेंसिल, गुटखा, मोबाइल, सब बोझ हमीं उठाएगा।
अब मास्क का नया झमेला, हम ही इसे सहते हैं,
कान नहीं, हम तो बस, हुक बनकर रहते हैं।
जो कुछ भी और टाँगना हो, ले आओ, भैया,
हम तैयार हैं, और सहने को, बन कर मजबूत हुक का सैया।
