संसद भवन के बाहर और राजनीतिक मंचों पर जो कुछ भी देखने को मिला, उसने देश के हर उस नागरिक को झकझोर कर रख दिया है, राहुल गांधी और संदीप दीक्षित द्वारा मेलोनी का अपमान और संसद के बाहर पवन खेड़ा का बंदर के साथ प्रदर्शन महज़ राजनीतिक स्टंट नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से राजनीतिक दिवालियापन का प्रमाण हैं।
क्या बचा है राजनीति की गरिमा का?
कभी हमारे देश की राजनीति में वैचारिक मतभेद होते थे, नीतियों पर बहस होती थी और संसद को सर्वोच्च चर्चा का केंद्र माना जाता था। लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है। विरोध के नाम पर जिस तरह की ड्रामेबाजी और प्रतीकात्मकता का सहारा लिया जा रहा है, वह न केवल बचकानी है बल्कि देश की महान लोकतांत्रिक परंपराओं का अपमान है।
देश का आम नागरिक आज महंगाई, रोजगार, और देश की प्रगति जैसे गंभीर विषयों पर बात सुनना और देखना चाहता है। लेकिन इसके विपरीत, राजनीतिक दल अपनी क्षुद्र महत्वाकांक्षाओं के लिए तमाशा खड़ा करने में व्यस्त हैं।
आहत है आम हिंदुस्तानी की भावना
आज सोशल मीडिया से लेकर चाय की टपरी तक सब के मन में एक ही सवाल है - क्या हमारी राजनीति का स्तर यही रह गया है?
देश की जनता सब देख रही है। वह जानती है कि कौन देश को आगे ले जाने की बात कर रहा है और कौन सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए ड्रामे रच रहा है। इस तरह के कृत्य जनता के बीच राजनेताओं की विश्वसनीयता के ताबूत में आखिरीकील साबित हो रहे हैं।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सबको है, लेकिन आज आवश्यकता इस बात की है कि हर जागरूक नागरिक अपनी आवाज़ उठाए और इन नेताओं को आईना दिखाए।
"जब राजनीति तमाशा बन जाए, तो जनता को खुद निर्देशक बनना पड़ता है।" आइए, इस ओछी और स्तरहीन राजनीति के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करें। इन नेताओं को यह अहसास कराना होगा कि देश की जनता इनकी नौटंकी से ऊब चुकी है। अब हमें गंभीर, जिम्मेदार और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने वाली राजनीति की जरूरत है, न कि इस तरह के राजनीतिक दिवालियापन की।
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